डॉ. श्रीराम लागू को राजकीय सम्मान सहित 21 तोपों की सलामी के साथ किया गया अंतिम संस्कार…

जी हां, डॉ. श्रीराम लागू का अंतिम संस्कार शुक्रवार को दोपहर राजकीय सम्मान के साथ पुणे, महाराष्ट्र में किया गया। हालांकि, हिंदू रिवाज के तहत अंतिम संस्कार की रस्में अदा नहीं की गईं। दिवंगत लागू के दामाद डॉ. श्रीधर कानेटकर के मुताबिक, “वे भगवान को नहीं मानते थे और चाहते थे कि हिंदू धर्म के तहत उनका अंतिम संस्कार न किया जाए। वे जो चाहते थे, हमने उसका सम्मान किया।

92 साल के डॉ. लागू का निधन 17 दिसंबर (मंगलवार) की रात हार्ट अटैक से हुआ था। उनके बेटे डॉ. आनंद लागू अमेरिका में रहते हैं। इसलिए उनके अंतिम संस्कार में तीन दिन का वक्त लगा। आनंद के पुणे पहुंचने के बाद शुक्रवार दोपहर एंबुलेंस से उनका पार्थिव शरीर पुणे स्थित वैकुंठधाम ले जाया गया और करीब 12.30 बजे विद्युत् शवदाह किया गया।

डॉ. लागू ने 50 साल में हिंदी और मराठी की 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उन्होंने मराठी, हिंदी और गुजराती के 40 से ज्यादा नाटकों में काम किया। 20 मराठी प्ले भी डायरेक्ट किए। उन्हें मराठी रंगमच के महान अभिनेताओं में गिना जाता है। उन्होंने ‘घरौंदा’, ‘लावारिस’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘हेरा-फेरी’, ‘एक दिन अचानक’ जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण किरदार निभाए। लागू पेशेवर ईएनटी सर्जन भी थे। उनकी आत्मकथा का शीर्षक ‘लमाण’ है, जिसका हिंदी में अर्थ ‘मालवाहक’ है।

श्रीराम लागू को 1978 में हिंदी फिल्म ‘घरौंदा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया। मराठी नाटक नट सम्राट में उनका निभाया गया किरदार काफी सराहा गया। 1960 के दौर में लागू ने पुणे और तंजानिया में मेडिकल प्रैक्टिस की। 1969 में वे फुल टाइम एक्टर हो गए। उनकी किताबों में गिधडे, गार्बो और आत्ममाथा शामिल हैं।

महाराष्ट्र सरकार ने राजकीय सम्मान में उन्हें 21 तोपों की सलामी दी। महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री सुभाष देसाई ने श्मशान घाट पहुंचकर डॉ. लागू के कॉफिन पर माल्यार्पण किया। अंतिम संस्कार में मनोरंजन जगत से नाना पाटेकर, अमोल पालेकर, उर्मिला मातोंडकर, विजय केंकरे, डॉ. जब्बार पटेल और राज ठाकरे समेत सिनेमा और राजनीति जगत की कई हस्तियां शामिल हुई थीं।

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