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आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है, बिहार के फ़िल्म निर्देशक नितिन नीरा चंद्रा ने खुद का OTT प्लेटफॉर्म स्टार्ट कर साबित किया…

बिहार में प्रतिभाओं की बिल्कुल कमी नहीं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग, राजनीति हो या कला और फिल्म जगत। बिहार की एक से बढ़कर एक हस्तियों ने मुश्किल हालात में और संसाधनों की कमी के बावजूद सफलता और प्रेरणा की मिसाल कायम की है। कुछ ऐसा ही कारनामा फिल्म निर्देशक नितिन नीरा चंद्रा ने भी किया है। नितिन ऐसे फिल्म निर्देशक हैं जिन्होंने बिल्कुल अलग तरह से दुनिया के सामने बिहार की तस्वीर पेश की है। उन्होंने भोजपुरी और मैथिली भाषा में बिहार की कहानी पर स्तरीय फिल्में बनाई है।

राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली मैथिल में बनी उनकी फिल्म “मिथिला मखान” को चर्चाओं के बावजूद बड़े पैमाने पर निवेशकों और चैनल के मालिक ने दर्शकों की रूचि से अलग बताते हुए रिलीज करने से माना कर दिया था। हालांकि बिहार के इस लाल ने मुश्किल हालात में रास्ता खोज निकाला और नेटफ्लिक्स, प्राइम वीडियो जैसा खुद का OTT प्लेटफॉर्म तैयार कर लिया।

नितिन अब अपने प्लेटफॉर्म पर मिथिला मखान को रिलीज करने की तैयारी में है। नितिन कहते हैं, “बिहार में 2008 के बाढ़ में वह नेपाल-बिहार बॉर्डर पर NGO के साथ काम कर रहे थे। इस दौरान बाढ़ से हुई त्रासदी ने मन में कई कहानियों को जन्म दिया। जिसपर 2011 में पटकथा लिखी, धीरे-धीरे कहानी विकसित हुई।

नितिन के अनुसार, “फिल्म बनाने के लिए 3-4 साल तक पैसे ढूंढते रहे मगर कोई निवेशक तैयार नहीं हो रहा था। हालांकि बहन नीतू चंद्रा ने साथ दिया और लोकेशन और कास्टिंग का काम शुरू हुआ। साथ में क्राउड फंडिंग भी शुरू हुई। लेकिन, ये फिल्म बनाने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसी दौरान सिंगापुर से समीर कुमार साथ आए और कुछ अन्य संसाधनों के साथ वह फिल्म बना सकें।

नितिन के मुताबिक फिल्म को बनाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी, क्योंकि हमें टोरंटो की सर्दियों में शूटिंग करना था। यह नहीं पता था कि वहां सर्दियों का मतलब सामान्य दिनों में -35 से लेकर -10 तक का तापमान होता है। हालांकि किसी तरह टोरंटो की गलियों में और उनके मेट्रो के अंदर गुरिल्ला शूटिंग पूरी की गई।

नितिन चंद्रा ने अपनी आप बीती शेयर करते हुए बताया कि टोरंटो में बीते वो सात दिन मेरे दिमाग में हमेशा के लिए छपे रहेंगे। मैं उन सड़कों पर चलता था जहां सड़क के किनारे बर्फ का कीचड़ होता था। मैं कैमरा मैन जस्टिन चेम्बर्स का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने फिल्म की शूटिंग की। हम आगे की शूटिंग के लिए मई के महीने में बिहार पहुंचे तो वहां का तापमान + 45 डिग्री था। भीषण गर्मी में 22 दिन शूटिंग चली।

इस कहानी में हम लोग जो चाहते थे उससे कोई समझौता नहीं किया। शूटिंग नेपाल के भी कुछ हिस्सों में हुई थी। बिहार के दरभंगा के अलावा पटना, सहरसा, सुपौल, मधुबनी और कटिहार में भी शूटिंग हुई। नीतू चंद्र की वजह से फिल्म में हरिहरन, सोनू निगम, सुरेश वाडेकर सबने मैथिली में गाने आए।

नितिन चंद्रा बताते हैं कि उन्होंने बड़े-बड़े चैनल के मालिकों से संपर्क किया। लेकिन, सभी ने फिल्म को नकार दिया, क्योंकि मैथिली भाषा का कोई खास सिनेमा नहीं है और न ही कोई ऐसा बाजार है।

नितिन चंद्रा ने हार नहीं मानी और यूट्यूब पर www.bejod. भोजपुरी मैथिली के वीडियो बनाकर माहौल बनाना शुरू कर दिए। साथ ही वीडियो में बताने लगे कि 2 अक्टूबर 2020 को “मिथिला मखान” फिल्म को उस पर रिलीज करेंगे। वहीं, फिल्म को सफलता मिली और राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

फिल्म के डीवीडी पहुंचने की आखिरी तारीख 15 जनवरी को भी वह याद करते हैं। बताते हैं कि किसी कारणवश 14 तारीख के रात को फिल्म भेज पाए थे। उन्हें यकीन नहीं था कि यह पहुंचेगी भी या नहीं। लेकिन, जब मार्च में राष्ट्रीय पुरस्कार के परिणामों को सुना, तब खुशी का ठिकाना नहीं था।

आपको बताते चलें कि पिछले दस सालों से लगातार ऐसा करने वाले नितिन बिहार के अकेले ऐसे निर्देशक हैं। वह मानते हैं कि बिहार का सिनेमा खड़ा हुआ तो हिंदी सिनेमा में संघर्ष करने की जरूरत बिहार के कलाकारों को नहीं पड़ेगी, जिस तरह से बांग्ला, असमिया, ओड़िया, दक्षिण या मराठी गुजरती का सिनेमा अपने पैरों पे खड़ा है वैसे ही बिहार का सिनेमा अपने जमीं पर खड़ा हो सकता है और आसानी से यहां के कलाकारों को काम यहीं मिल सकता है।

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