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भोजपुरी सिनेमा की आज की स्थिति का अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वो है “अश्लीलता”

जी हां, सिनेमा को समाज का आईना माना जाता है. लेकिन जब समाज का कुलीन वर्ग आईने को अछूत मान ले तो वह बदरंग नजर आने लगता है. वर्तमान समय में भोजपुरी सिनेमा की यही स्थिति है. भोजपुरी सिनेमा का नाम सुनते ही उसे अश्लील बताकर समाज के तथाक​थित कुलीन वर्ग नाक- भौं सिकोड़ने लगते हैं. लेकिन, ‘अश्लीलता’ की तय परिभाषा की परिधी मे कोई हिंदी, बांग्ला या अंग्रेजी भाषा की फिल्म ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ आती है, तो उसे ‘कहानी की मांग’ का वास्ता देकर हमारा कुलीन वर्ग स्वीकार कर लेता है. यह असमंजस की स्थिति एक पक्ष है.

मजे कि बात है कि यह वर्ग कुल भोजपुरी समाज की जनसंख्या का महज 20 प्रतिशत है. यानी 80 प्रतिशत भोजपुरी समाज के लोग भोजपुरी फिल्में देखते ही नहीं हैं.
‘भोजपुरी फिल्मों में अश्लीलता’ एक जटिल एवं संक्रमित विषय है, जिसके लिए न तो किसी एक समूह पर दोष लगाया जा सकता है और न ही किसी एक रेखीय प्रयास से इसका समाधान किया जा सकता है. फिर भी व्यावहारिक तौर पर यह हो सकता है कि हिंदी, तमिल, मराठी एवं अंग्रेजी फिल्मों की तरह भोजपुरी फिल्मों के लिए भी मल्टीप्लेक्सों में कुछ शो आरक्षित कर दिये जाये.
इससे अब तक जो बड़ा वर्ग भोजपुरी फिल्मों से दूरी बनाये है, वह सिनेमाघर की ओर रुख करेगा. जिस फिल्म में दम होगा, वह चलेगी.

अभीतक तो फ़िल्मबन्धु उत्तर प्रदेश ही भोजपुरी फ़िल्मों को सब्सिडी देती थी मगर अब बिहार सरकार भी देने की घोषणा कर दी। इसमें सरकार को पहल करना चाहिए ताकि निर्माताओं को लगे कि अश्लीलता व फूहड़ता से परे भी दुनिया हैं और साफ सुथरी फ़िल्म को ही बढ़ावा देना चाहिए जिन पर भोजपुरी में फिल्में बनाकर दुनिया के 11 देशों में फैले 18 करोड़ भोजपुरी भाषियों के दिलों पर राज किया जा सकता है.

इसी बात को ध्यान में रखते हुए केके मीडिया ग्रुप ने एक भोजपुरी फ़िल्म का मुहूर्त किया की साफ सुथरी फ़िल्म बनायेगें पर मानो उन्होंने बहुत बड़ी गल्ती कर दिया इसके प्रोड्यूसर संजय ए सिंह जो 25 तीस साल से इंडस्ट्री के लिए ही काम कर रहे हैं उनको पचासों फोन आ गए सर आप क्या कर रहे हो, क्यों कर रहे हो भोजपुरी आप जैसे लोगों के लिए नही है डूब जायेंगें, कारण पूछने पर मालूम पड़ा की भोजपुरी और साफ सुथरी !! कौन खरीदेगा कौन देखेगा?

संजय जी के साफ सुथरी फ़िल्म बनाने की वजह कि फ़िल्म परिवार के साथ देखा जा सके, और परिणाम क्या हुआ सिंह साहब कंफ्यूज़, फ़िल्म अटक गई मगर अभी मालूम पड़ा कि जल्द ही फ़िल्म की शूटिंग स्टार्ट होने वाली है। कुणाल सिंह लगभग 15/20 साल बाद इस तरह की भूमिका में दिखेगें वहीं प्रिंस सिंह राजपूत नायक और नायिका रुपा सिंह है विलेन की कमान उमेश सिंह के कंधे पर है।

मज़ेदार बात तो यह है कि दूसरे पक्छ की सोंच ऐसी नही है उनकी सोंच ऐसी है कि निर्माता को वही करना चाहिए जो लोग देखना चाहते हैं, मगर संजय ए सिंह इस बात को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहते हैं कि हमारा भोजपुरी समाज आज भी इज़्ज़तदार है और परिवार में शिष्टाचार है अच्छे परिवार के लोग थियेटर जाना तो दूर घर में भोजपुरी गाने तक सुनना पसंद नही करते, क्योंकि ……..….मेंरा बोलना ठीक नही।

संजय सिंह का मानना है की कल्चर के मामले में हिंदुस्तान की धरती पर यूपी, विहार, राजस्थान, एमपी क्लचर की जननी है एक बार आप जााइये आपको बोलने समझने या समझाने की ज़रूरत ही नही पड़ेगी। अगर अश्लीलता परोसकर व्यवसाय करना है तो मुझे नही करना है ऐसा व्यवसाय।

जबकि दूसरा पक्ष ‘जो रोगी को भावे, सो वैद्य फरमावे’ की तर्ज पर भोजपुरी सिनेमा के निर्माता यह तर्क देते हैं कि दर्शकों को जो पसंद है, वही वे परोस रहे हैं. इसके उलट सच्चाई यह है कि दर्शकों को क्या पसंद है? यह मापने का पैमाना आजतक किसी को पता नहीं है. अपनी गर्दन बचाने के लिए उनकी ओर से यह तर्क आता है.

तीसरा पक्ष है भोजपुरी फिल्म के पारंपरिक दर्शक – वर्ग का सीमित होना. जो फॉर्मूला फिल्में आजकल भोजपुरी में बन रहीं हैं, उसे देखने वाले दर्शकों का एक खास वर्ग है, जो पूर्णिया से पुणे, बेतिया से बेंगलुरु और मोतिहारी से मुंबई तक फैला हुआ है उन लोगों की पसंद ही भोजपुरी की बर्बादी की नींव है। अपना सुझाव कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं।

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