मंगलवार को आपका मंगल हो आपकी राशि के साथ साथ जानिए सप्त ऋषिओं एवं सप्तऋषि तारा मंडल के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी आचार्य जी से…

प्रस्तुत

आचार्य रमेश चन्द्र तिवारी धानिवबांग नालासोपारा पालघर महाराष्ट्र 🌹🌹🙏
सम्पर्क सूत्र -9518782511
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🙏🌹🙏 अथ पंचांगम् 🙏🌹🙏
ll जय श्री राधे ll
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दिनाँक -: 17/09/2019,मंगलवार
तृतीया, कृष्ण पक्ष
आश्विन
“””””””””””””””””””””””””””””””””””””(समाप्ति काल)

तिथि————तृतीया16:32:40 तक
पक्ष—————————–कृष्ण
नक्षत्र———–अश्विनी30:43:33
योग——————घ्रुव23:20:16
करण———विष्टि भद्र16:32:40
करण—————भाव29:24:46
वार————————-मंगलवार
माह————————–आश्विन
चन्द्र राशि———————– मेष
सूर्य राशि———-सिंह13:01:54
सूर्य राशि———————- कन्या
रितु——————————-वर्षा
आयन——————-दक्षिणायण
संवत्सर———————-विकारी
संवत्सर (उत्तर)———–परिधावी
विक्रम संवत—————–2076
विक्रम संवत (कर्तक)——2075
शाका संवत——————1941

मुम्बई
सूर्योदय—————–06:06:14
सूर्यास्त——————18:20:59
दिन काल—————12:14:44
रात्री काल————–11:45:42
चंद्रास्त——————08:32:11
चंद्रोदय——————20:24:44

लग्न—-सिंह29°43′ , 149°43′

सूर्य नक्षत्र———–उत्तराफाल्गुनी
चन्द्र नक्षत्र——————-अश्विनी

          पद, चरण  

चु—-अश्विनी 10:58:46

चे—-अश्विनी 17:34:51

चो—-अश्विनी 24:09:48

       ग्रह गोचर  

ग्रह =राशी , अंश ,नक्षत्र, पद

सूर्य=सिंह 29°42 ‘ उ o फा o, 1 टे
चन्द्र =मेष 00°23 ‘ अश्विनी ‘ 1 चु
बुध=कन्या 08°26 ‘ हस्त’ 1 पू
शुक्र= कन्या 08°13, पू oफा o’ 4 पी
मंगल=सिंह 24°12 ‘ पू oफ़ा o ‘ 4 टू
गुरु=वृश्चिक 22°21 ‘ ज्येष्ठा , 2 या
शनि=धनु 22°13′ पू oषा o ‘ 3 फा
राहू=मिथुन 19°51 ‘ आर्द्रा , 4 छ
केतु=धनु 19 ° 51′ पूo षाo, 2 धा

     शुभा$शुभ मुहूर्त

राहू काल 15:17 – 16:49अशुभ
यम घंटा 09:10 – 10:42अशुभ
गुली काल 12:14 – 13:45अशुभ
अभिजित 11:49 -12:38शुभ
दूर मुहूर्त 08:33 – 09:22अशुभ
दूर मुहूर्त 23:03 – 23:52अशुभ

  गंड मूल06:06 - 30:44*अशुभ

    चोघडिया, दिन

रोग 06:06 – 07:38अशुभ
उद्वेग 07:38 – 09:10अशुभ
चर 09:10 – 10:42शुभ
लाभ 10:42 – 12:14शुभ
अमृत 12:14 – 13:45शुभ
काल 13:45 – 15:17अशुभ
शुभ 15:17 – 16:49शुभ
रोग 16:49 – 18:21अशुभ

     चोघडिया, रात

काल 18:21 – 19:49अशुभ
लाभ 19:49 – 21:17शुभ
उद्वेग 21:17 – 22:46अशुभ
शुभ 22:46 – 24:14शुभ अमृत 24:14 – 25:42शुभ चर 25:42 – 27:10शुभ रोग 27:10 – 28:38अशुभ काल 28:38 – 30:07*अशुभ

        होरा, दिन

मंगल 06:06 – 07:07
सूर्य 07:07 – 08:09
शुक्र 08:09 – 09:10
बुध 09:10 – 10:11
चन्द्र 10:11 – 11:12
शनि 11:12 – 12:14
बृहस्पति 12:14 – 13:15
मंगल 13:15 – 14:16
सूर्य 14:16 – 15:17
शुक्र 15:17 – 16:19
बुध 16:19 – 17:20
चन्द्र 17:20 – 18:21

       होरा, रात

शनि 18:21 – 19:20
बृहस्पति 19:20 – 20:19
मंगल 20:19 – 21:17
सूर्य 21:17 – 22:16
शुक्र 22:16 – 23:15
बुध 23:15 – 24:14
चन्द्र 24:14* – 25:13
शनि 25:13* – 26:11
बृहस्पति 26:11* – 27:10
मंगल 27:10* – 28:09
सूर्य 28:09* – 29:08
शुक्र 29:08* – 30:07

नोट— दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है।
प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है।
चर में चक्र चलाइये , उद्वेगे थलगार ।
शुभ में स्त्री श्रृंगार करे,लाभ में करो व्यापार ॥
रोग में रोगी स्नान करे ,काल करो भण्डार ।
अमृत में काम सभी करो , सहाय करो कर्तार ॥
अर्थात- चर में वाहन,मशीन आदि कार्य करें ।
उद्वेग में भूमि सम्बंधित एवं स्थायी कार्य करें ।
शुभ में स्त्री श्रृंगार ,सगाई व चूड़ा पहनना आदि कार्य करें ।
लाभ में व्यापार करें ।
रोग में जब रोगी रोग मुक्त हो जाय तो स्नान करें ।
काल में धन संग्रह करने पर धन वृद्धि होती है ।
अमृत में सभी शुभ कार्य करें ।

दिशा शूल ज्ञान-------------उत्तर*

परिहार-: आवश्यकतानुसार यदि यात्रा करनी हो तो घी अथवा गुड़ खाके यात्रा कर सकते है l
इस मंत्र का उच्चारण करें-:
शीघ्र गौतम गच्छत्वं ग्रामेषु नगरेषु च l
भोजनं वसनं यानं मार्गं मे परिकल्पय: ll

       अग्नि वास ज्ञान  

यात्रा विवाह व्रत गोचरेषु,
चोलोपनिताद्यखिलव्रतेषु ।
दुर्गाविधानेषु सुत प्रसूतौ,
नैवाग्नि चक्रं परिचिन्तनियं ।। महारुद्र व्रतेSमायां ग्रसतेन्द्वर्कास्त राहुणाम्
नित्यनैमित्यके कार्ये अग्निचक्रं न दर्शायेत् ।।

  15 + 3 + 3 + 1 = 22 ÷ 4 = 2 शेष

आकाश लोक पर अग्नि वास हवन के लिए अशुभ कारक है l

      शिव वास एवं फल 

18+ 18 + 5 = 41 ÷ 7 = 6 शेष

क्रीड़ायां = शोक,दुःख कारक

      भद्रा वास एवं फल 

स्वर्गे भद्रा धनं धान्यं ,पाताले च धनागम:।
मृत्युलोके यदा भद्रा सर्वकार्य विनाशिनी।।

सांय 16:32 तक समाप्त

स्वर्ग लोक = शुभ कारक

        विशेष जानकारी    
  • तृतीया श्राध्द
  • चतुर्थी व्रत चंद्रोदय रात्रि 20:35
  • सर्वार्थ सिद्धि योग
  • कन्यायां सूर्य 13:01 पर संक्रांति

*विश्वकर्मा जयंती पूजा ( बंगाल)

           शुभ विचार   

स्वयं कर्म करोत्यत्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते ।।
।।चा o नी o।।

जीवात्मा अपने कर्म के मार्ग से जाता है. और जो भी भले बुरे परिणाम कर्मो के आते है उन्हंं भोगता है. अपने ही कर्मो से वह संसार में बंधता है और अपने ही कर्मो से बन्धनों से छूटता है.

           सुभाषितानि 

गीता -: क्षेत्रज्ञविभागयोग अo-13

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌ ।,
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥,

श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि (सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जल-मृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि को बाहर की शुद्धि कहते हैं तथा राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर की शुद्धि कही जाती है।,) अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह॥,7॥,

          दैनिक राशिफल   

देशे ग्रामे गृहे युद्धे सेवायां व्यवहारके।
नामराशेः प्रधानत्वं जन्मराशिं न चिन्तयेत्।।
विवाहे सर्वमाङ्गल्ये यात्रायां ग्रहगोचरे।
जन्मराशेः प्रधानत्वं नामराशिं न चिन्तयेत ।।

🐏मेष
पहले की गई मेहनत का फल मिलेगा। मित्रों व रिश्तेदारों का सहयोग करने का अवसर प्राप्त होगा। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आय में बढ़ोतरी होगी। स्वास्‍थ्य को नजरअंदाज न करें। जल्दबाजी से बचें। कठिन कार्य सहज ही सफल होंगे। चिंता रहेगी।

🐂वृष
भूले-बिसरे संबंधी साथी मिलेंगे। उत्साहवर्धक सूचना प्राप्त होगी। आत्मसम्मान बना रहेगा। व्यय होगा। पारिवारिक चिंता बनी रहेगी। व्यापार-व्यवसाय अच्‍छा चलेगा। नौकरी में सहकर्मी साथ देंगे। घर-बाहर प्रसन्नता का वातावरण निर्मित होगा।

👫मिथुन
भेंट व उपहार की प्राप्ति हो सकती है। यात्रा से लाभ होगा। कारोबार में वृद्धि के योग हैं। आलस्य न कर भरपूर प्रयास करें। भाग्य का साथ बना है। समय का लाभ लें। नौकरी में प्रभाव बढ़ेगा। किसी बड़े काम को करने की प्रबल इच्छा होगी। आवश्यक वस्तु गुम हो सकती है।

🦀कर्क
फालतू खर्च पर नियंत्रण रखें। दुष्टजनों से सावधानी आवश्यक है। किसी बड़ी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। किसी के उकसाने में आकर या भावना में बहकर कोई निर्णय न लें। लेन-देन में जल्दबाजी से बचें। पुराना रोग उभर सकता है।

🐅सिंह
रुका हुआ पैसा मिलने के योग हैं। ऐश्वर्य के साधनों पर खर्च होगा। यात्रा लाभदायक रहेगी। लाभ के अवसर हाथ आएंगे। नौकरी में उच्चाधिकारी प्रसन्न रहेंगे। शत्रु सक्रिय रहेंगे। किसी से कहासुनी हो सकती है। परिवार की चिंता रहेगी। प्रमाद न करें।

🙍कन्या
नए काम मिलने के योग हैं। कोई नया उपक्रम प्रारंभ करने की योजना बनेगी। कार्यस्थल पर परिवर्तन संभव है। मित्रों की सहायता कर पाएंगे। घर-बाहर पूछ-परख रहेगी। नौकरी में चैन रहेगा। कारोबार अच्‍छा चलेगा। जोखिम व जमानत के कार्य टालें।

⚖तुला
किसी धर्मस्थल के दर्शन इत्यादि का कार्यक्रम बन सकता है। सत्संग का लाभ प्राप्त होगा। कानूनी अड़चन दूर होकर स्थिति अनुकूल बनेगी। शत्रु सक्रिय रहेंगे। दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप न करें। विवाद को टालें। कारोबार से लाभ होगा।

🦂वृश्चिक
चोट व दुर्घटना से शारीरिक हानि हो सकती है। कार्य करते समय लापरवाही न करें। स्वास्थ्य का पाया कमजोर रहेगा। शत्रु पस्त होंगे। व्यापार-व्यवसाय अच्‍छा चलेगा। नौकरी में कार्यभार रहेगा। मित्रों का सहयोग समय पर प्राप्त होगा।

🏹धनु
प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी। भेंट व उपहार देना पड़ सकता है। यात्रा मनोरंजक रहेगी। कारोबार अच्‍छा चलेगा। नौकरी में सहकर्मी साथ देंगे। विवाद से बचें। समय सुखमय व्यतीत होगा। आय में वृद्धि होगी। अपेक्षाकृत सभी कार्य समय पर पूरे होंगे। प्रमाद न करें।

🐊मकर
भूमि व भवन संबंधी सभी रुके कार्यों में गति आएगी। पार्टनरों से सहयोग प्राप्त होगा। प्रतिद्वंद्वी मैदान छोड़ेंगे। व्यापार-व्यवसाय मनोनुकूल चलेगा। बेरोजगारी दूर करने के प्रयास सफल रहेंगे। दूसरों के झगड़ों में न पड़ें। उन्नति होगी।

🍯कुंभ
लेखन-पठन-पाठन आदि के काम उत्साह व लगन से कर पाएंगे। पार्टी व पिकनिक आदि की योजना बनेगी। मनोरंजन का अवसर प्राप्त होगा। नौकरी में कोई नया कार्य कर पाएंगे। धन प्राप्ति सुगम होगी। जल्दबाजी न करें। समय की अनुकूलता का लाभ लें।

🐟मीन
कोई बुरी खबर प्राप्त हो सकती है, धैर्य रखें। मेहनत अधिक होगी। समय पर काम न होने से खिन्नता रहेगी। लेन-देन में जल्दबाजी न करें। नौकरी में उच्चाधिकारियों की अपेक्षा बढ़ेगी। स्वास्थ्य कमजोर रह सकता है। आय में निश्चितता रहेगी।

🙏आपका दिन मंगलमय हो🙏

🙏🌹🌹🙏
जानिए सप्त ऋषिओं एवं सप्तऋषि तारा मंडल
के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी।
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अंगिरा ऋषि👉 ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

विश्वामित्र ऋषि👉 गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

वशिष्ठ ऋषि👉 ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।

कश्यप ऋषि👉 मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

जमदग्नि ऋषि👉 भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

अत्रि ऋषि👉 सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

अपाला ऋषि👉 अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

नर और नारायण ऋषि👉 ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

पराशर ऋषि👉 ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

भारद्वाज ऋषि👉 बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने ‘यंत्र सर्वस्व’ नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।

वेदों के रचयिता ऋषि : ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं।

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- 1.वशिष्ठ, 2.विश्वामित्र, 3.कण्व, 4.भारद्वाज, 5.अत्रि, 6.वामदेव और 7.शौनक।

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत। विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।। अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।

  1. वशिष्ठ : राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

2.विश्वामित्र : ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।

  1. कण्व : माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।
  2. भारद्वाज : वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम ‘रात्रि’ था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। ‘भारद्वाज-स्मृति’ एवं ‘भारद्वाज-संहिता’ के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने ‘यन्त्र-सर्वस्व’ नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने ‘विमान-शास्त्र’ के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

  1. अत्रि : ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

  1. वामदेव : वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।
  2. शौनक : शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।
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